ये बात चिर सत्य है की शक्ति को पाना जितना कठिन है उसे नियंत्रण में और सर्वहितकारी बना कर रख पाना उतना ही कठिन ! ये बात अमेरिका के सम्बन्ध में एकदम सही लगती है। अमेरिका ने एक शंघर्ष के बाद स्वतंत्रता पाई और दुसरे विश्व युद्घ के बाद वो विश्वा में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हुआ ! शक्ति के साथ कुछ जिम्मेदारिया भी जुड़ी रहती है... इसमे संदेह नही की अमेरिका आज भी विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक सैनिक शक्ति है । पर इस शक्ति को पाकर शीत युद्घ के बाद अमेरिका का जैसा व्यवहार रहा है वो हमारे मन में उसकी नकारात्मक छवि ही बना रहा है,
अमेरिका अपने लिए तो एक मजबूत लोकतान्त्रिक देश है इसमे दो राय नही पर वैश्विक मामले में उसके क्रियाकलाप एक तानाशाह जैसे ही है! चाहे इराक हो या तालिबान फिलिस्तीन हो या कोरिया और पाकिस्तान हो इरान अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय मामलो के नियंत्रणकारी संस्था राष्ट्र संघ को जिस तरह से एकतरफा अपने हितों के लिए प्रयोग किया है और अब जिस तरह वो पाकिस्तान के बारे में जानते हुए भी लगातार भारत के साथ दोहरा मापदंड आजमा रहा है वो ये बताने के लिए काफ़ी है की अमेरिका विश्व मामले में केवल अपने निजी हितों को ही महत्वा देता है! ये सही है की हर राष्ट्र अपनी विदेश निति को अपने हितों के अनुरूप ही बानाता है पर अमेरिका कभी कभी बहुत ही स्वार्थपूर्ण होती है ! और उसके कार्य एकतरह से दबाव बनाने wale rahe है !
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